वैदिक चिकित्सा विज्ञान
वैदिक चिकित्सा विज्ञान को चार भागों में विभक्त किया जा सकता है: 1. आथवर्णी 2. अगिंरासी 3. दैवी और 4. मनुष्यजा
आथर्वणीरांगिरसी देवी मनुष्यजा उता |
औषधयः प्रजायन्ते यदा त्वम् प्राणं जिन्वसि | | (अथर्व 11/4/16)
अथर्वेद में स्पष्ट उल्लेख है कि उपरोक्त बह्मा चिकित्साएँ तब तक कार्यकारी नहीं होतीं जब तक कि वह शरीरस्थ प्राण की शक्ति से प्रेरित नहीं की जाती हैं | वेदोक्त वचन है कि ‘हे प्राण जब कि तू कार्यकारी है तब तक ही आथर्वणी, आंगीरसी , दैवी और मनुष्यकृत औषधियाँ फलप्रद होती हैं |
आथर्वणी चिकित्सा से तातपर्य आत्मिक एवं मानसिक शक्ति द्वारा रोग निवारण है | शरीर के अंगों, इन्द्रियादि के रस के द्वारा चिकित्सा का नाम अंगिरसी चिकित्सा है | मर्म चिकित्सा का आधार आंगीरसी चिकित्सा को माना जा सकता है | मर्म चिकित्सा में मर्म उत्प्रेरण के माध्यम से मस्तिष्क सहित शरीरस्थ विभिन्न अंगो की कार्यक्षमता विभिन्न ग्रंथियों और ऊतकों द्वारा स्रवित होने वाले विभिन्न रास- रसायन द्वारा नियंत्रित की जा सकती है | इस प्रक्रिया से रोग प्रतिरक्षण , रोग निवारण एवं शक्ति संचयन जैसे उददेश्यों की पूर्ति सम्भव है | आंगीरसी चिकित्सा में रस से तातपर्य उन कार्यकारी तत्वों से है जो शरीर की विभिन्न क्रियाओं को नियंत्रित एवं सम्पादित करतें हैं |