वैदिक चिकित्सा विज्ञान की पृष्ठभूमि
मनुष्य के इस धरा पर प्रादुर्भाव से पहले सृष्टि का निर्माण हो गया था | इसमें मनुष्य के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध थे , जिसमें भोजन और स्वास्थ्य की आवस्यकताओं की पूर्ति के संसाधन महत्वपूर्ण हैं | तत्संभंधि ज्ञान के क्रम को पीड़ी दर पीढ़ी बढाने के लिए विविध प्रकार के उपाय प्रचलित हुए | इसके लिए विशिष्ठ मानक और अचार संहिता उपलब्ध है | कोई भी कार्य एक विशिष्ट विधि और अनुशासन के माध्यम से ही संभव है इसी के अंतर्गत वैदिक चिकित्सा विज्ञान का अध्ययन – अध्यापन प्रारम्भ हुआ | चिकित्सा कार्य अत्ययंत पुनीत और पुण्यदायक कार्य है | ‘मानव सेवा ‘ , माधव सेवा’ कहकर इसकी महत्ता को प्रदर्शित किया जाता है | इसी संदर्भ में चिकित्सक द्वारा ली जाने वाली शपथ निम्न्वत है |
न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गंपुनर्भवम
कामये दुःख तप्तानां प्रणिनम्रतिनाशनम | |
राज्य प्राप्ति और मोक्ष से अधिक श्रेयस्कर यदि कोई कार्य कहा गया है तो वह दु:ख संतत्प प्राणियों के रोग और कष्ट को नष्ट करना है | इसीलिए मुझे राज्य, स्वर्ग तथा अपुनर्भव की कामना नहीं है |
रोग एवं कष्ट निवारण के कार्य में जो व्यक्ति प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से अपना योगदान देते हैं , वह पुण्य के भगी होतें हैं | चिकित्सक प्रत्यक्ष रूप से निवारण करता है, परन्तु जो व्यक्ति अपनी सेवा और संसाधनों से चिकित्सा कार्य में सहयोग करते है, चिकित्सक से अधिक महत्वपूर्ण कार्य करते हैं चिकित्सालय की अवस्थापना, औसदियों का निर्माण, चिकित्सक संबधी शोध, चिकित्सा में परा चिकित्सकीय कार्य भी अत्यंत महत्वपूर्ण है |